हरियल की लकड़ी
रामनाथ शिवेन्द्र के उपन्यासों में ग्रामीण चेतना सीमांत की संघर्ष गाथा रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यासकार ‘हरियल की लकड़ी’ अरविन्द चतुर्वेद दुनिया के जिस ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ में हम रहते हैं, आज़ादी के अठ्ठावन साल बाद आज भी सीमांत पर कई ऐसी जिन्दगियां हैं जिन्हें आज़ादी की रोशनी मयस्सर नहीं, उलटे तंत्र के शिकंजे में वे छटपटा रही हैं। विकास की संजीवनी तो खैर उन्हें क्या मिले, विडंबना ही है कि विकास की मार ने उनका जीना दूभर कर रखा है। ये सीमांत के दूर-दराज के जंगली गॉव भी हो सकते हैं और शहरों की झुग्गी-झोपड़ियां या फुटपाथी जिन्दगी भी। कथाकार रामनाथ शिवेन्द्र के हाल ही में आये उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ में जिस तरह से सीमांत की जीवन गाथा उपस्थित हुई है वह भौगोलिक रूप से भी उŸारप्रदेश का दक्षिणी-पूर्वी सीमांत है। सोनभद्र जनपद के रूप में वही सीमांत है जो कोयला, सीमेन्ट, अल्युमिनियम की बदौलत औद्योगिक अंचल और बिजली कारखानों के चलते ऊर्जा राजधानी जैसे चमकदार जुमले से संबोधित किया जाता है तो दूसरी ओर इसी सीमांत पर विकास की मारी, वि...